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Monday, 16 October 2017

आज की देवभूमि

देवभूमि आज भारत में प्राणदायनी है देवभूमि समूचे भूभाग को अन्नदायनी है देवभूमि शस्य श्यामला भारत माता का दिव्य भाग है। सम्पूर्ण भारत को आठ प्रतिशत सुध आक्सीजन का स्रोत है देवभूमिव 49.65% जल स्रोत है देवभूमि ज्ञानपिपासु साधकों को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करने वाला तथा शिक्षा का केंद्र रहा है आदिकाल से देवभूमि। देवभूमि अपने सपूतों को भारत माँ के लिए न्यौछावर करता रहा है सदियों से आज भी समूचे भारत में 26% सैनिक देवभूमि से है। उत्तराखण्ड की माटी में ऊर्जा है धैर्य है प्रेम है समर्पण है। देवभूमि धर्ती पर ब्रह्मांड की सब से अनमोल पवित्र और पाक जगह है।

समुद्र तल से 400 मीटर की ऊंचाई से सुरु हो जाता है देवभूमि और 2300 मीटर तक है देवभूमि औषधि, खनिजों व रसायनों का भण्डार है देवभूमि। पर ये सिर्फ बाहरी लोग जानते है देवभूमि का कोई नही जानता इस सत्य को। देवभूमि के लोग तो सिर्फ ये जानते है कि हम सुदूर है दुर्गम है। हम पाना उसे चाहते है जिस का अस्तित्व ही नही है हम हर कीमत पर भौतिककता के दास होना चाहते है पर अन्जाम बहुत भयानक है भौतिकता के ये भी जानते है। आज प्रगतिशील देशों में प्रतिब्यक्ति आय हम से ज्यादा नही है पर स्वस्थ हम ज्यादा है। उन देशों के लोग पैसा सिर्फ इस लिए कमा रहे है ताकि स्वस्थ जीवनशैली अपना सके पर कुछ फायदा नही हो रहा है। कुदरत से खिलवाल भयानक रूप धारण करता है।

अगर आज पहाड़ों में बिकाश हो भी जाता है तो क्या हम को सुख शन्ति व आबोहवा वही मिलेगी जो आज है। हम बिकास के नाम पर अपनी जड़ों को काट रहे है। हर साल दरसार हम सामाजिक और भौगोलिक परिवर्तन देख रहे है फिर भी हम संमझ नही रहे है कि विकास की कीमत क्या होगी। पहाड़ों के खिसकना ग्लेशियरों का टूटना हिम युग व जल प्रलय का सूचक है बुग्यालों का सूखना व बैदिक पक्षी हिलांस, घनुड़ी, घुगति ,नीलकण्ठ, गरूड़ प्रजाति का लुप्त होना मानवता के लिए भयानक संकेत है। आज उत्तराखण्ड में मृत्यु दर देश के अन्य राज्यों से कम है यह ये दर्शाता है कि हम शुद्ध आबोहवा में सांसे ले रहे है। पूरे प्रदेश में रोगियों की संख्या निम्न के 4 थे स्थान पर है शिक्षा के क्षेत्र में बिना सरकारी पहल के हम सदियों से 2 स्थान पर है देश के अन्य शहरों के  मुक़ाबके शिक्षण संस्थान उत्तराखण्ड में कम है फिर भी बिगत 8 साल से हमारी शिक्षा ग्रोथ 34% बढ़ी है लिंग अनुपात में हजार लड़कों मर 978 लड़कियां है जो बड़ा मार्जन नही है।

नवोदित उत्तराखण्ड बस कुछ दिनों में बालिक हो जाएगा 18 साल के अल्प सफर में खट्टे मीठे दिन भी हम ने देखे है। पर आज तक कोई भी ग्राम सेवक न तो पूर्णतः पहाड़ों को समझ पाया न पहाड़ किसी ग्राम सेवक को संमझ पाया 8 सेवकों के 18 साल में सेवा देना कहीं न कहीं प्रश्नचिन्ह लगाता है कि आखिर क्या चाहिए लोगों को व क्या उम्मीदें है जनता की जनार्धन से।

मेरे कहने का तातपर्य है कि संयम सायद सफकता की निशानी है कोई न कोई तो जानता होगा। वर्षों से हिमालय भाग पलायन की विभिषिका से त्रस्त है और दिन प्रतिदिन हालात बत से बतर होते जा रहे है। राज्य बिछेदन के बाद हालात सुधरने थे पर परिणाम पक्ष में न हुए सायद तब तक देर हो चुकी थी या जिस उम्मीद से हम ने अलग चूल्हा चौका सम्भाला था उस पर खरे न उतर सके हम।

आज भी परिस्थिति भयानक है उच्च व मध्यम वर्ग अपनी जीविका व भौतिक सुख के लिए हिमालय तलहटी कस्बों का रुख कर रहे है जिस की वजह से छोटे शहरों पर अनावश्यक दबाव है और पहाड़ बिरानियाँ देख रही है। जनछादित गाँव में आज बियांबार नजर आते है। खण्डहरों को देख कर लगता है प्रथम विश्व युद्ध यहीं हुआ होगा। तरक्की पसन्द हम भी है पर पलायन और तरक्की में फर्क समझते है। जो भी परिवार आज पहाड़ों से रोजगार व भौतिकता का दोहन करने निकलता है वह फिर वापस नही जाता है पहाड़ों की जवानी पानी व रवानी शहरों में नाले साफ कर रही है।

देवभूमि का पलायन देश के अन्य 28 राज्य से भिन्न है यहां शहरों में नोकरीं करने वाला हर तीसरा ब्यक्ति कभी लोटा ही नही अपने गाँव और हर ब्यक्ति अपनी कमाई का 67% पैसा शहरों में ही खर्च कर रहा है पहाड़ों तक अगर पैसा नही आएगा तो फायदा क्या हुआ प्रदेश को। जिस ब्यक्ति ने अपने जीवन के 23,25 साल देवभूमि में काटे है उस ने अहसान के तौर पर कभी प्रदेश में आर्थिक योजना में भागीदार नही निभाई यही वजह है हमारा प्रदेश 1690 करोड़ के घाटे से सुरु हुआ था जो 44 हजार करोड़ हो गया है। आज जितने भी 3 हजार गांव जनशून्य हुए है उस का अतिरिक्त भार नजदीकी शहरों पर पड़ा है जैसे देहरादून, कोटद्वार, रामनगर,उधमसिंह नगर,रुड़की,हरिद्वार।

विकास योजना पहाड़ों में कभी जाती ही नही है ये सत्य ही नही ताम्रपत्र पर लिख सकते है हम। उस की वजह जनजागृति है। हम लोग अपने तक ही सीमित में उस की वजह है अत्यधिक प्रलोभन व लोकलुभावन के बावजूद भी काम काज न होना। संक्रिर्ण बिचारधारा व सुनियोजित प्रकृति दोहन। आज आलम ये है कि एड्स जैसी भयानक बीमारी देवभूमि में 3% की रफ्तार से बड़ रहा है। मानसिक विकलांग हो रहा है भावी पीढ़ी शारीरिक रूप से कुपोषित हो रहा है नवजात केंद्र की व who की पहलके बाद भी हर साल देवभूमि में कुपोषण के हजारों मामले सामने आरहे है बिना पंजीकृत पर्यटकों की वजह से HIV संक्रमण वो अनैच्छिक लोगों के आवागमन से समाज प्रूवर्तित हो रहा है।

समाज के बदलते प्रारूप से हम भी अछूते नही है पर हम ने अचानक से रूप बदला है हम ने हर उस सीमा को लांघा है जिस के लिए दुनिया पहले से तैयार थी हम ने अपना ही नही अपितु समूचे मानवता के जीवन को खतरे में डाला है। हम उस जघन्य उपराद के भागीदार है जिस को हम नाटकीय तरीके से अनजाने में किया।

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