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Monday, 23 October 2017

नया किराएदार

मै बिगत 15 साल से घर से बाहर हूँ घर मतलब गाँव से बाहर हूँ सुना है जीविका के लिए घर से बाहर हूँ पर 15 साल बाद मुझे एहसास हुआ है कि जीविका नही अपनी छोटी सोच की वजह से मैने घर छोड़ा है खुद का विश्लेषण करने के बाद पता चला कि मूर्खता अज्ञानता की वजह से मैने घर छोड़ा है न कि जीविका के लिए। मेरे गाँव में अभी भी 83 लोग जी रहे है भूख से कोई नही मरा तो मुझे ऐसा क्या चाहिए था या मैने ऐसा क्या हांसिल कर लिया जो उन लोगों के पास नही है और मेरे पास है।

आत्म चिन्तन खुद का विश्लेषण करना सीखा है घर छोड़ने के बाद पर सायद खोया भी बहुत कुछ है कीमत ज्यादा चुका दी कम व क्षण भर के सपनों के लिए,,,ज्यादा खाने के लिए मै भूखा ही रह गया।
खैर जो हुआ वो हुआ अभी मेरे पास वक्त है कि अब कुछ ऐसा किया जाय कि खुद भी घर जाऊं और अपनों को भी गाँव की राह ले चलूं,,,,

मुझे किसी ने घर से भागने के लिए बाध्य नही किया न कर सकता है। मुझे मेरी महत्वाकांक्षी मन घर से भगा लाया जिस का खामियाजा भुगत रहा हूँ। आज दिल्ली के संगम विहार में मेरी छोटी से पहचान है 8*8 का एक कमरा किराया दार न कोई मुझे जानता है न किसी से मुझे मतलब है मकानमालिक को जानता हूँ सिर्फ महीने की 7 तारिक को उन से भी सिर्फ किराया तक कि जानपहचान है बाकी कुछ नही कभी अनहोनी हो जाये तो वो भी पल्ला झाड़ देंगे पर पहचान यही है मेरी किराया दार जनाने कितने लोगों ने इस कमरे को रसोई को बाथरूम को स्तेमाल किया होगा क्या धर्म रहा होगा उन का क्या गौत्र रहा होगा पता नही। पर गाँव में मेरी माँ किसी के घर में घुसने पर उस आदमी के सात पुस्तों की कुण्डली मांग लेती थी। रूम से ऑफिस के लिए निकलता हूँ तो एक भीड़ हूँ जो ग्रामीण सेवा या मैट्रो या बेट्री वाली गाड़ी के धक्के खाता है लगता है दिल्ली पर मै बोझ हूँ मैट्रो भी अब हम जैसे लोगों का बोझ नही उठा सकती है। 4 साल बाद किराया बढ़ गया है जहां पहले 24 रुपया लगता था वहां अब 36 रुपया लगता है। मैट्रो की भीड़ में सांस लेना दुस्वार है।

ऑफिस जैसे तैसे पहुंचते है तो वहाँ भी एक पहचान है गेजिग्नेसन बाकी कुछ नही एक डिपार्टमेंट का लीडर हूँ पर खोखला लीडर जो गाँव की छोटी सी कठनाई से भाग के आया हुआ है जिस ने धूप बारिष के डर से घर छोड़ दिया वो घर जिस में हजारों साल से मेरे घर परिवार के लोग रहे है। उस घर को जिस ने अन्न धन्न प्यार ममता से मेरे परिवार को पाला है। खुशहाली छोड़ कर हम मशीन बन गए है नींद में भी सोते नही है चलते रहते है ताकि कोई हम से आगे न निकल जाए बुलेट ट्रेन से भी तेज भागना चाहते है। आज हालत ये है कि अगर सुबह dtc या मैट्रो में सीट मिल गई तो लगता है बैकुंठपुर पहुंच गए है। मेरी पहचान dtc में 10 रुपये के टिकट के लिए झगड़ना कि भाई जी रोज जाता हूँ 5 रुपया लगता है यही है या सब्जी लेते समय धनिया पुदीना हरीमिर्च माँगना है या फिर नया किरायेदार है।

होटल में जॉब करता हूँ तो रात के 2,3 बजे रूम में पहुंचता हूँ कही बार जेब कतरे मिल जाते है अब मुझे ही पता है मेरे जेब में क्या है कितना है उस बेचारे गरीब असहाय जेब कतरे को नही पता खैर कुछ बार लुटा भी हूँ पर क्या करूँ जीना है तो सहना है। एक यन्ड्रोइड फोन है जिस के बिना जीवन सधुरा लगता है आज अहसास हो रहा है भगवान ने अंगूठा किस लिया बनाया होगा सायद फोन चलसने को। इस फोन को लुटेरों से बचाना होता है मैट्रो में भी हर स्टेशन पर इस बात की सूचना दी जाती है कि बैग लैपटॉप पीठ पर न लटकाएं चोरी हो सकती है इस का मतलब है चोरी होती है मैट्रो में भी। सुअरों कुत्तों का गढ़ है साम्राज्य है संगम विहार,खानपुर,बदर पुर, तिरलोक पूरी, मंगोलपुरी, सुल्तान पुर,जखीरा,कापसहेड़ा, रजोकरी, बाहरी दिल्ली पूरा ही समझो ।दिल्ली का संगम बिहार तिगड़ी बत्रा दक्षिण पूरी पुष्प भवन,खानपुर, अतिसंवेदनशील इलाका है। खैर अगर रात 3 बजे गली में पहुंच भी गया तो बेसहारा लाचार भूखे कुत्ते स्वागत के लिए खड़े होते है क्या करें वो भी पर सच्चाई है भूख इन्सान को भी कुत्ता बना देती है फिर ये तो है ही कुत्ते उन की प्रवृति यही है कोई दिक्कत नही हम को फाइनली हम good morning से पहले रूम में पहुंच तो जाते है पर कही बार बिजली नही होती तो दिल बैठ जाता है और रही कसर पड़ोसी पूरी कर लेते है बगल वाले किरायदार व अन्य पड़ोसी जाग जाते है। उन के ऑफिस का वक्त हो जाता है उन रूम का सब्जी का छोंका मेरी नींद खराब कर देती है सुबह उन के बच्चे स्कूल जाने के लिए रोते है वो अलग नहाने के लिए पानी भरना खाने के लिए पानी  भरना वो अलग अगर पानी न भरा तो समझौता करो फिर नहाने परफ्यूम मार के ऑफिस जाना पड़ेगा फिर तो फिर हमारी नींद भी खराब पर दिन भर के थकान के बाद आंखे तो सो जाते है पर दिमाग नही सोता है।

समाज के अलग अलग वर्ग ने मेरी पहचान अपने मुताबित बना लिया है। हर प्राणी की मेरे प्रति अलग सोच है कोई नया किराएदार कहता है कोई नया chef कोई पढ़ाकू खड़ूस कोई उत्तरकाण्ड का नया भैजी पर मै खुस हूँ क्यों कि कम से कम कोई मेरी बात तो करता है। जानवर क्या कहते होंगे पता नही पर सायद यही कहते होंगे कि लो हमारी तरह रात्री बिचरण करने वाला पागक आगया है इस को सुकून नही चैन नही और रात को हमारी नींद भी खराब कर देता है।

पर ऐसा मेरे गाँव में नही था मेरे साथ। वहाँ मैं अपने दादा जी अपने पापा के नाम से जाना जाता था हमारे घर का पता लगभग 400 साल पुराना है या उस से भी पुराना पर पहचान पूरे जिल्ले में है यहां दिल्ली में अगले घर वाले को हम नही जानते न कोई हम को,, इसी लिए दिल्ली में मकान,कोठी,बंगला,फ्लैट होते है और गाँव में सिर्फ घर होते है घर वही है जहां प्यार ममता अपना पन भावना संस्कार बस्ते है। आज हम खुद के नजर में अपना पहचान खो रहे है आज हम को अपने खेतों के नाम तक पता है पर यहां अपनी गली का नम्बर भी नही पता क्योंकि हर बार नोकरी बदल जाती है और मेरा ठिकाना भी। जब तक एक पता याद होता है मेरा पत्ता साफ हो जाता है तो पहचान नही बन पाई है मेरी पहचान क्या है खुद को नही पता पर गाँव जब जाता हूँ तो चांदनी चौक सरोजनीनगर के ठेली से नोनंब्रांडेड कपड़े खरीद कर जाता हूँ ताकि मेरे गाँव वालों को लगे कि कुछ तो कमा रहे हूँ साल में 2 बार घर जाता हूँ हिसाब किताब गड़बड़ हो जाता है पर भला हो दोस्तों को जो घर जाने के लिए कर्जा देदेते है कुछ कमेटी से उठा लेता हूँ ब्याज पर। काम चल रहा है वरना पहचान ही खत्म थी। फिर भी गाँव में खेती करने नही जाऊंगा क्यों कि झूटी सान भी तो है मेरे अन्दर व इस बात का गुरुर की मैने 12 पास किया है पर मुझे अब पता चल रहा है कि दिल्ली में 23 हजार जानवर ऐसे है जिन के पास BA की पढ़ाई के दिक्यूमेंट्स है आर्मी व पुलिश के कुत्ते घोड़े है वो।

फिलहाल PM को CM को कोश रहा हूँ पता है भला तो नही होगा न कोई मेरी बात सुनेगा पर मन को सुकून मिलता है दिन भर fb पर बकवास करता हूँ मन को शान्ति मिलती है मन लगा रहता है गाँव की याद भुला केता हूँ खुद पर गुस्सा कम आता है खुद की नजरों में गिरता नही हूँ अपनी पहचान को खोजने का वक्त नही लगता है।

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देवेश आदमी (प्रवासी)
सम्पर्क-:9716541803
रिखणीखाल

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