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Thursday, 18 January 2018

घर गाँव की खुदेड़ यादें

एक जमाना वह था जब हम ,आग मॉँग कर लाते थे ।
उसी आग को फूँक-फूँक कर घर की  आग जलाते थे ।।
पढ़ने के लिए लम्पू था सहारा , कभी लालटेन जलाते थे ।
उसकी बत्ती घुमा घुमा कर , मुश्किल से काम चलाते थे ।।
गेहूँ की रोटी बड़ी चीज थी , बड़े बुजुर्ग ही खाते थे ।
दाल भात मेहमान नवाजी , सब झंगरियाल ही खाते थे ।।
कोदा , कौणी और झंगोरा , यही तो गाँव में होता था ।
चैंसू , बाड़ी पत्यो और फॉणू , हर घर में तब बनता था ।।
गौथ गथवाणी तोर त्वराणी, बड़े दिनों में बनती थी ।
फुल्टे का भात भडडू की दाल , उसकी रसाणॅ गजब थी ।।
भंगजीर की चटणी लोण मसाला , माँ सिलोटे में पिसती थी ।
जख्ये की छोकाॅण गजब , पास -पड़ोस तक जाती थी ।।
स्कूल से आकार पाणी लाते , फिर गाय बैल चराते थे ।
साँझ को माँ के पिछे जाकर , घास काट कर लाते थे ।।
जाॅदरे से कोदे की पिसाई , दादी की याद कराती है ।
उखल्यारों में धान कुटाई , माँ की याद दिलाती है ।।
काफल चुलू बुराॅस भमोरा , थैला भर -भर लाते थे ।
व्रत त्योहारों में बण से , तैडू  खोद कर लाते थे ।।
दिवाली में आग जलाकर , भेलौं को खूब घुमाते थे ।
जब लगता मंडाण गाँव में , औजी जागर गाते थे ।।
रोटानों से रोट बनाकर , चावल के अरसे बनाते थे ।
जब होती बैणयों की बिदाई , उन्हें कलेऊ देते थे ।।
पठालीदार कुड़ो की याद ,तिबारी की याद भी आती है ।
दादा का हुक्का उसकी गुड़ -गुड़ , कानो में आज भी बजती है ।।
क्या उलार रहता था हमको , भेलो में जाने का ।
पकौड़ी और जलेबी खाकर , झूलों पर चढ़ने का ।।
दूर बसें है गाँव से अपने ,अब जा भी नहीं सकते है ।
घर गुडयार की यादों से बस , केवल आँख भिगो सकते है ।।



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