पंचायतीराज कानून कितना सक्षम है या कितनी पारदर्शी है ये सब जानते है। ग्रामीण भारत का विकास न होना व ग्रामीण भारत और शहरी भारत के बीच में बड़ती खाई इस बात का प्रमाण है कि पंचायतीराज सिर्फ दिखावा है। ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन करना भी पंचायतीराज का गर्दिशों में जाना है।
अब जब कि पंचायतों को डिजिटल व कैसे लेस करने का कानून बन चुका है व अमल में लाया जा रहा है तो उस पर भी हाथ ढ़ाई कोष नही चला है। पंचायतों और सरकारी महकमों के बीच की खींचातानी में उपभोक्ता लाभवांगीत नही हो रहा है। जरूरतमंद लोगों तक योजना न पहुंचना व अशिक्षतों को नेतृत्व सौंपना भी पंचायतीराज का बिफक होना है।
प्रथम पंचायतीराज सन १८९५ की लड्स मिंटो की अध्यक्षता लख़नऊ में गठित हुई थी मगर वो सिर्फ अंग्रेजो की बनाई पंचायतीराज थी सुप्रीम कोर्ट के जज पीटर डिकोस्टा जस्टिस के खण्डपीठ ने इस प्रथम पंचायतीराज को उज्ज्वल भारत का वेद कहा था। मगर समय के साथ साथ पंचायतीराज में भी कुपोषण के लक्षण दिखते रहे आज आलम ये है कि पूरी तालाब में मछलियां मर गई या कोई इस गन्दगी में उतरना नही चाहती सब यहाँ मगरमच्छ है एक दूजे को काट रहे है।
आजाद भारत में इस पंचायतीराज में संसोधन कर १९५९ तक मसौदा तैयार किया गया। पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम, तालुका और जिला आते हैं। जिन को पूर्णरूप से स्वतंत्र व स्वलम्बी बनाने का सपना देखा गया था।मगर आधुनिक भारत में प्रथम बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान के नागौर जिले के बगदरी गाँव में २ अक्टूबर १९५९ को पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई।
ग्रामीण भारत को एक दिसा देने के लिए बनाया गया प्रथम पंचायतीराज।
तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल साहब ने तुरन्त हरकत में आते हुए इस को लागू करने के मांग तो १९५७ में किया था मगर अम्बेडकर के मसौदे में व संसद के तीनों अंगों के बीच में आमसहमति नही बन सकी थी फिर भी १९५९ में तैयार पंचायतीराज के दिशानिर्देश अनुसार भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४० में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया हैं। १९९१ मैं संविधान में ७३वां संविधान संशोधन अधिनियम व १९९२ करके पंचायत राज संस्था को संवैधानिक मान्यता दे दी गयी हैं।
चिफजस्टिस बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें (१९५७) -अशोक मेहता समिति की सिफारिशें (१९७७) -डॉ एल ऍम सिन्घवी समिति (१९८६) -ग्राम सभा को ग्राम पंचायत के अधीन किसी भी समिति की जाँच करने का अधिकार है।
अब इस सफर को तो यहीं रुकाना नही था तो इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। 24 अप्रैल 1993 भारत में पंचायती राज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मार्गचिन्ह था क्योंकि इसी दिन संविधान में कांग्रेसी सरकार ने मनमोहन सिंह जी की अध्यक्षता में (73वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा हासिल हुआ और इस तरह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को वास्तविकता में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया गया था।
पंचायतीराज के (73वें संशोधन अधिनियम) 1993 में निम्नलिखित प्रावधान किये गये थे। जो कुछ अछे थे मगर कुछ में आज भी खामी है। मगर बिगत २० में अनेकों सरकारें आतीजाति रही मगर किसी ने इन खामियों पर अपनी जनर भर न टिकाई।
१-: पंचायती त्रि-स्तरीय ढांचे की स्थापना (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति या मध्यवर्ती पंचायत तथा जिला पंचायत)
२-: ग्राम स्तर पर ग्राम सभा की स्थापना
३-: हर पांच साल में पंचायतों के नियमित चुनाव
४-: अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
५-: महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों का आरक्षण करना।
६-: पंचायतों की निधियों में सुधार के लिए उपाय सुझाने हेतु राज्य वित्ता आयोगों का गठन करना।
७-: राज्य चुनाव आयोग का गठन होना।
73वां संशोधन अधिनियम पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में काम करने हेतु आवश्यक शक्तियां और अधिकार प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को अधिकार प्रदान करता है। ये शक्तियां और अधिकार इस प्रकार हो सकते हैं:
संविधान की ११वीं अनुसूची में सूचीबध्द २९ विषयों के संबंध में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करना और उनका निष्पादन करना
१-: कर, डयूटीज, टॉल, शुल्क आदि लगाने और उसे वसूल करने का पंचायतों को अधिकार
२-: राज्यों द्वारा एकत्र करों, डयूटियों, टॉल और शुल्कों का पंचायतों को हस्तांतरण होना।
अगला भाग...!
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देवेश आदमी
अब जब कि पंचायतों को डिजिटल व कैसे लेस करने का कानून बन चुका है व अमल में लाया जा रहा है तो उस पर भी हाथ ढ़ाई कोष नही चला है। पंचायतों और सरकारी महकमों के बीच की खींचातानी में उपभोक्ता लाभवांगीत नही हो रहा है। जरूरतमंद लोगों तक योजना न पहुंचना व अशिक्षतों को नेतृत्व सौंपना भी पंचायतीराज का बिफक होना है।
प्रथम पंचायतीराज सन १८९५ की लड्स मिंटो की अध्यक्षता लख़नऊ में गठित हुई थी मगर वो सिर्फ अंग्रेजो की बनाई पंचायतीराज थी सुप्रीम कोर्ट के जज पीटर डिकोस्टा जस्टिस के खण्डपीठ ने इस प्रथम पंचायतीराज को उज्ज्वल भारत का वेद कहा था। मगर समय के साथ साथ पंचायतीराज में भी कुपोषण के लक्षण दिखते रहे आज आलम ये है कि पूरी तालाब में मछलियां मर गई या कोई इस गन्दगी में उतरना नही चाहती सब यहाँ मगरमच्छ है एक दूजे को काट रहे है।
आजाद भारत में इस पंचायतीराज में संसोधन कर १९५९ तक मसौदा तैयार किया गया। पंचायती राज व्यवस्था में ग्राम, तालुका और जिला आते हैं। जिन को पूर्णरूप से स्वतंत्र व स्वलम्बी बनाने का सपना देखा गया था।मगर आधुनिक भारत में प्रथम बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा राजस्थान के नागौर जिले के बगदरी गाँव में २ अक्टूबर १९५९ को पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई।
ग्रामीण भारत को एक दिसा देने के लिए बनाया गया प्रथम पंचायतीराज।
तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल साहब ने तुरन्त हरकत में आते हुए इस को लागू करने के मांग तो १९५७ में किया था मगर अम्बेडकर के मसौदे में व संसद के तीनों अंगों के बीच में आमसहमति नही बन सकी थी फिर भी १९५९ में तैयार पंचायतीराज के दिशानिर्देश अनुसार भारतीय संविधान के अनुच्छेद ४० में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया हैं। १९९१ मैं संविधान में ७३वां संविधान संशोधन अधिनियम व १९९२ करके पंचायत राज संस्था को संवैधानिक मान्यता दे दी गयी हैं।
चिफजस्टिस बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें (१९५७) -अशोक मेहता समिति की सिफारिशें (१९७७) -डॉ एल ऍम सिन्घवी समिति (१९८६) -ग्राम सभा को ग्राम पंचायत के अधीन किसी भी समिति की जाँच करने का अधिकार है।
अब इस सफर को तो यहीं रुकाना नही था तो इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। 24 अप्रैल 1993 भारत में पंचायती राज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मार्गचिन्ह था क्योंकि इसी दिन संविधान में कांग्रेसी सरकार ने मनमोहन सिंह जी की अध्यक्षता में (73वां संशोधन) अधिनियम, 1992 के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा हासिल हुआ और इस तरह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के स्वप्न को वास्तविकता में बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया गया था।
पंचायतीराज के (73वें संशोधन अधिनियम) 1993 में निम्नलिखित प्रावधान किये गये थे। जो कुछ अछे थे मगर कुछ में आज भी खामी है। मगर बिगत २० में अनेकों सरकारें आतीजाति रही मगर किसी ने इन खामियों पर अपनी जनर भर न टिकाई।
१-: पंचायती त्रि-स्तरीय ढांचे की स्थापना (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति या मध्यवर्ती पंचायत तथा जिला पंचायत)
२-: ग्राम स्तर पर ग्राम सभा की स्थापना
३-: हर पांच साल में पंचायतों के नियमित चुनाव
४-: अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण।
५-: महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों का आरक्षण करना।
६-: पंचायतों की निधियों में सुधार के लिए उपाय सुझाने हेतु राज्य वित्ता आयोगों का गठन करना।
७-: राज्य चुनाव आयोग का गठन होना।
73वां संशोधन अधिनियम पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में काम करने हेतु आवश्यक शक्तियां और अधिकार प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को अधिकार प्रदान करता है। ये शक्तियां और अधिकार इस प्रकार हो सकते हैं:
संविधान की ११वीं अनुसूची में सूचीबध्द २९ विषयों के संबंध में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं तैयार करना और उनका निष्पादन करना
१-: कर, डयूटीज, टॉल, शुल्क आदि लगाने और उसे वसूल करने का पंचायतों को अधिकार
२-: राज्यों द्वारा एकत्र करों, डयूटियों, टॉल और शुल्कों का पंचायतों को हस्तांतरण होना।
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देवेश आदमी
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